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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 35
नन्दन्तु साधककुला ह्यलमात्मनिष्ठाः शापाः पतन्तु समयद्विषि योगिनीनाम् । सा शाम्भवी स्फुरतु कापिं समाप्यवस्था यस्यां गुरोश्चरणपङ्कजमेव सत्यम् ॥
आत्मनिष्ठ साधकों के समूह आनन्दित हों समायाचार से द्वेष करने वाले योगिनियों के शाप से नष्ट हों। वह सामरस्य की अवस्था वाली शम्भु की पत्नी पार्वती मेरे हृदय में प्रकट हो जायें। जिस शक्ति के गुरु रूप चरण कमल ही सत्य हैं वे हमारे हृदय में स्फुरण करें।
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