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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 75
नराः किमपि जानन्ति स्वात्मध्यानपरायणाः । तदा यत्परमं सौख्यमिति वक्तुं न शक्यते ॥
अपने अनुष्ठान में तल्लीन होकर वे और सब कुछ भूल जाते हैं। यह सुख किस प्रकार का होता है? इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
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