इच्छैव शास्त्रसम्पत्तिरित्याज्ञा परमेश्वरि ॥ तत्र यद् यत् कृतं कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम् । तत्सर्वं देवताप्रीत्यै जायते सुरसुन्दरि ॥
हे परमेश्वरि! इच्छा ही शास्त्रसम्पत्ति है, यही आज्ञा है, अतः उक्त अवस्था में जो शुभ या अशुभ कर्म होते हैं, हे सुरसुन्दरि! वे सब देवता प्रीति के लिए होते हैं।
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