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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 18
क्वचित् यदृच्छया प्राप्तमलिपात्रन्तु भक्तितः । आदाय पूर्ववज्जप्त्वा पिबेद्देवि गुरुं स्मरन् ॥
कभी यदि दैवयोग से अलिपात्र (मद्यपूर्ण पात्र) प्राप्त हो, तो भक्ति से ग्रहण कर पूर्ववत् अभिमन्त्रित कर हे देवि! गुरुदेव का स्मरण करते हुये उसे पान करे।
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