कभी यदि दैवयोग से अलिपात्र (मद्यपूर्ण पात्र) प्राप्त हो, तो भक्ति से ग्रहण कर पूर्ववत् अभिमन्त्रित कर हे देवि! गुरुदेव का स्मरण करते हुये उसे पान करे।
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