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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 76
स्वयमेवानुभूयन्ते शर्कराः क्षीरपानवत् । ईदृशं तादृशं सौख्यमिति वक्तुं न शक्यते । दृश्यते पुलकाद्येर्यत् तद्ब्रह्मध्यानमुच्यते ॥
इस अवस्था में वे मन वचन से परे परम सुख को प्राप्त करते हैं। यह सुख शर्करा और दुग्ध के स्वाद के समान स्वयं ही अनुभव द्वारा ज्ञेय है। वह सुख किस प्रकार का होता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पुलक आदि के द्वारा जो सुखपूर्ण अवस्था दिखाई देती है, वह 'ब्रह्मध्यान' कहलाती है।
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