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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 66
विकृतिं मनसो हित्वा यदोल्लासः प्रवत्र्त्तते । तदा तु देवताभावं भजन्ते योगिपुङ्गवाः ॥
मन के विकृत न होने पर देव-भाव-मन के विकार को हटाकर जब उल्लास प्रवर्तित होता है तब श्रेष्ठ योगी देवताभाव को प्राप्त करते हैं।
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