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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 50
स्वाभीष्टचेष्टाचरणं प्रौढान्तः परिकीर्त्तितः । प्रौढान्तोल्लासिताद्देवि मुदिते योगिमण्डले । योगिनीमण्डले चैव क्रमादानन्दमुच्यते ॥ तदारूढेषु वीरेषु कार्याकार्यं न विद्यते ।
चक्र में सम्मिलित साधकों द्वारा अपनी अभीष्ट चेष्टा का करना 'प्रौढान्त' उल्लास कहा गया है। हे देवि! इस उल्लास से योगी और योगिनीमण्डल के प्रमुदित होने पर क्रमशः आनन्द होता है और उन उल्लासित वीरों में कार्याकार्य का विचार नहीं रहता।
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