स्वपात्रस्थितहेतुञ्च न दद्याद्वैरवाय च ।
यदि दद्यात्कुलेशानि देवताशापमाप्नुयात् ॥
अपने पात्र का हेतु (मद्य) भैरव को अर्पित न करे, यदि वह फिर भी देता है तो हे कुलेशानि! देवता का शाप उसे प्राप्त होता है।
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