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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 4
तत्त्वत्रयं स्यादारम्भः कथितः कुलनायिके । 'कथितस्तरुणोल्लासस्तरुणं सुखमम्बिके ॥ बौवनं मनसः सम्यगुल्लासः सुस्थितिः प्रिये । स्खलनं दृमनोवाचां प्रौढमित्यभिधीयते ॥
हे कुलनायिके! तीन तत्त्वों के उदित होने से 'आरम्भ' उल्लास होता है। हे अम्बिके! तरुणसुख के होने पर 'तरुणोल्लास' माना जाता है। हे प्रिये! मन के सम्यक् उल्लास की स्थिति को 'यौवनोल्लास' कहा जाता है और दृष्टि, मन, वचन का स्खलन होने पर 'प्रौढ़ोल्लास' होता है।
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