तदुल्लासे कृता नाना या चेष्टा सा च सत्क्रिया ।
कार्याकार्यविचारन्तु यः करोति स पातकी ॥
इस प्रकार उक्त उल्लास में विविध प्रकार की जो चेष्टा की जाती है, वह सत्क्रिया ही होती है। उसके सम्बन्ध में उचित अनुचित का विचार जो करता है, वह पाप का भागी होता है।
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