एकपात्रं न कुर्वीत यदि साक्षात् कुलेश्वरः ।
मन्त्राः पराङ्मुखा यान्ति विघ्नश्चैव पदे पदे ।।
भले ही स्वयं कुलेश्वर क्यों न हो, 'एक पात्र' न करे अर्थात् एक ही पात्र द्वारा द्रव्यपान न करे। अन्यथा मन्त्र विपरीत हो जाते हैं और पग-पग पर विघ्न होते हैं।
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