देहस्थ अखिल देवगण, गजानन, क्षेत्राधिप, भैरव, योगिनियाँ, बटुक, यक्ष, पितर, भूत, पिशाच, ग्रह, अन्य भूचारी एवं आकाश में विचरण करने वाले, दिशाओं में विचरण करने वाले, वेताल, चेटक (इन्द्रजालक) और पितर गण, कुल पुत्र (कुल के उपासक) योगी के दीप्त चरु को पीकर तृप्त होवें।
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