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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 40
देहस्थाखिलदेवता गजमुखाः क्षेत्राधिपा भैरवा योगिन्यो वटुकाश्च यक्षपितरो भूताः पिशाचा ग्रहाः । अन्ये भूचरखेचरा दिशिचरा वेतालकाश्चेटका-स्तृप्यन्तां कुलपुत्रकस्य पिबतः पानं सदीपञ्चरुम् ॥
देहस्थ अखिल देवगण, गजानन, क्षेत्राधिप, भैरव, योगिनियाँ, बटुक, यक्ष, पितर, भूत, पिशाच, ग्रह, अन्य भूचारी एवं आकाश में विचरण करने वाले, दिशाओं में विचरण करने वाले, वेताल, चेटक (इन्द्रजालक) और पितर गण, कुल पुत्र (कुल के उपासक) योगी के दीप्त चरु को पीकर तृप्त होवें।
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