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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 71
उन्मनाः पतनोत्थाने मूर्छना च मुहुर्मुहुः । उन्मनाख्यतदुल्लासे चक्रे वीरसमर्चिते ॥ चिरं संविदधाते तौ यौ हि कर्मपराक्षरौ । परं ब्रह्मानुसन्धानाका‌ङ्क्षिणौ कुलनायिके ॥ देहेन्द्रियाणामवशः समवस्था निगद्यते । समवस्थामिधे तस्मिन् ततोल्लासे समं भवेत् ॥
उन्मना उल्लास, अनवस्था और शाम्भवी मुद्रा - 'उन्मना' नामक छठे उल्लास से युक्त होने पर गिरने और उठने की दो क्रियायें तथा बारम्बार मूर्छा होती है। परब्रह्म के अनुसन्धान की इच्छा से युक्त इन दो क्रियाओं के चिरकाल तक सम्पन्न होने पर देह और इन्द्रियों से परे अनवस्था होती है, जो सातवें उल्लास में है।
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