ऊध्वें ब्रह्माण्डतो वा दिवि गगनतले भूतले वा तले वा पाताले वानले वा सलिलपवनयोर्यत्र कुत्र स्थिता वा ।
क्षेत्रे पीठोपपीठादिषु च कृतपदा धूपदीपादिकेन प्रीता देव्यः सदा नः शुभबलिविधिना पान्तु वीरेन्द्रवन्धाः ॥
ब्रह्माण्ड से ऊपर स्वर्ग में, गगन में, भूमि पर, ताल तलैया में, पाताल में, अग्नि में, जल में, वायु में (इन सभी पञ्चमहाभूतों में) जहाँ कहीं भी स्थित देव है, (तीर्थ) क्षेत्र में, पीठों में, उपपीठों में जहाँ भी धूप एवं दीप आदि (पंचोपचारों से) प्रसन्न देवियाँ हमारी शुभ बलिदान विधि से पूजित एवं वीरेन्द्र से बन्ध वे देवियाँ सदा हमारी रक्षा करें।
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