शक्त्युच्छिष्टं पिबेद् द्रव्यं वीरोच्छिष्टञ्च चर्वणम् ।
आत्मोच्छिष्टं न दातव्यं परकीयं न भक्षयेत् ॥
शक्ति का उच्छिष्ट द्रव्य पीना चाहिये और वीरों का उच्छिष्ट चर्वण खाना चाहिये। अपना उच्छिष्ट न देना चाहिये और न दूसरों का खाना चाहिये।
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