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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 33
नन्दन्तु नीतिनिपुणा निरवद्यनिष्टा निर्मत्सरा निरुपमा निरुपद्रवाश्च । नित्यं निरञ्जनरता गुरवो निरीहाः शान्ताश्च शान्तमनसो हृतशोकशङ्काः ॥
नीति निपुण एवं निरवद्यनिष्ठ, निर्मत्सर, उपमारहित, उपद्रवों से रहित कुल साधक प्रसन्न होएँ। नित्य शिव में आसक्त, इच्छारहित गुरु गण शान्त मन वाले होऐं। हृदय के शोक की शङ्का भी न रहे और सभी चराचर जगत् शान्ति प्राप्त करें।
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