कुलेश श्रोतुमिच्छामि करुणामृतवारिधे । उल्लासभेदं देवेश द्रव्यपात्रादिसङ्गमम् ॥
रत्युद्वासनकालञ्च श्रीचक्रस्थितिमेव च । चेष्टां कौलिकशक्तीनां वद मे परमेश्वर ॥
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! हे करुण रूप अमृत के समुद्र! मैं उल्लास के भेद के विषय में सुनना चाहती हूँ। हे परमेश्वर! हे देवेश! द्रव्यपात्रादि की सङ्गति, रति, उद्वासनकाल (Time of abandonment), श्री चक्र की स्थिति और कौलिक शक्तियों की चेष्टा के विषय में बताइये।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।