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अध्याय 12 — भूगोलाध्याय:

सूर्य सिद्धांत
90 श्लोक • केवल अनुवाद
तदनन्तर सूर्याश पुरुष को करबद्ध प्रणाम कर अत्यन्त भक्ति भाव से अर्चन कर मयासुर ने ये प्रश्न पूछे।
हे भगवन्‌! इस पृथ्वी का परिमाण क्‍या है? इसका स्वरूप केसा है? पृथ्वी का आश्रय (आधार) क्‍या है? इसके कितने विभाग हैं तथा कौन कौन सी सात पाताल भूमि हैं?
सूर्य अहोरात्र (दिनररात्रि) की व्यवस्था कैसे करते है तथा भुवनों (भूर्भुवादि १४ भुवनों) को प्रकाशित करते हुये पृथ्वी की परिक्रमा किस प्रकार करते हैं?
देवताओं और असुरों की अहोरात्र व्यवस्था एक-दूसरे से विपरीत क्‍यों और कैसे होती है तथा सूर्य की भगण पूर्ति के साथ इनका अहोरात्र कैसे होता है?
पितरों का अहोरात्र एक चान्द्र मास क़े तुल्य तथा मनुष्यों का अहोरात्र ६० घटी के तुल्य होता है। यही (षष्टि घटिकात्मक) अहोरात्र सर्वत्र क्यों नहीं होता इसमें क्या-हेतु (कारण) है?
दिन, वर्ष, मास और होरा के स्वामी समान क्‍यों नहीं होते? नक्षत्र, मण्डल, ग्रहों के साथ-साथ केसे भ्रमण करते हैं तथा इनका आधार क्‍या है?
भूमि के ऊपर उर्ध्वोर्ध्व क्रम से कितनी उचाई पर ग्रहों एवं नक्षत्रों की कक्षायें हैं तथा उनमें परस्पर कितना अन्तराल है? उनकी मात्रा (संख्या) तथा उनका क्रम क्या है?
ग्रीष्पऋतु में सूर्य की रश्मियाँ अति तीक्ष्ण होती है किन्तु हेमनत ऋतु में उस प्रकार (अर्थात्‌ तीक्ष्ण) नहीं होती। कितनी दूरी तक सूर्य की रश्मियाँ प्राप्त होती है? उनके आधार पर कालमान कितने हैं? तथा उनका प्रयोजन क्‍या है?
हे भूत भावन भगवान्‌! मेरे इन संशयों को दूर करें। आप सर्वद्रष्टा हैं। अत: आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी मेरे इन संशयों को दूर करने में समर्थ नहीं है।
इस प्रकार भक्ति पूर्वक मय द्वारा कहे गये वचनों (पूछे गये प्रश्नों) को सुनकर सूर्याशावतार पुरुष ने पूर्वोक्त ग्रहचरित के अनन्तर अत्यन्त रहस्यमय उत्कृष्ट ज्ञानयुक्त उत्तरवर्ती ज्योतिष शास्त्र रूपी अध्यायों को पुन: कहा।
सूर्याश पुरुष ने मय को संबोधित करते हुये कहा - “एकाग्रचित्त होकर सुनो! मै अत्यन्त गुह्य (रहस्यमय) अध्यात्म संज्ञक शास्त्र को कह रहा हूँ। मेरे पास अतिभक्तों (जिज्ञासु शिष्यों) के लिए कुछ भी अदेय नहीं है।"
वासुदेव परं ब्रह्म हैं। इन्हीं की मूर्ति परम पुरुष है, ये अव्यक्त, निर्गुण, शान्त और २५ तत्वों से परे हैं तथा अव्यय हैं, अर्थात्‌ निर्विकार हैं।
सर्वत्र अनुभव योग्य सड्डर्षण देव ने इसी प्रकृति के अन्तर्गत प्रविष्ट होकर सर्वप्रथणथ जल की रचना की। अनन्तर उस जल में बीज स्वरूप अपने तेज को स्थापित किया।
वह बीज स्वरूप तेज स्वर्ण अण्ड का रूप धारण कर लिया। वह चारों तरफ से अन्धकार से घिरा हुआ था। वहाँ (अण्ड के भीतर) सर्वप्रथम सनातन भगवान्‌ अनिरुद्ध प्रकट हुये।
यही भगवान्‌ हिरण्य गर्भ हैं जिनका वेदों में उल्लेख है। सर्वप्रथम (आदिभूत) उत्पन्न होने से इन्हें आदित्य तथा अण्ड से प्रसूत होने के कारण सूर्य कहा गया।
परम ज्योतिसम्पन्न होने के कारण इन्हें सूर्य तथा अन्धकार से परे होने से (अन्धकार को नष्ट करने से) सविता कहते हैं। ये भगवान्‌ भूतभावन (प्राणियों का पोषण करने वाले) समस्त भुवनों को प्रकाशित करते हुये परिभ्रमण कर रहे हैं।
यहीं भगवान्‌ प्रकाश की आत्मा हैं, यहीं अन्धकार का नाश करने वाले हैं, ये हीं महत्‌ तत्व के रूप में विख्यात हैं। ऋचायें (ऋग्वेद) इनका मण्डल है। सामवेद इनकी रश्मियाँ हैं तथा यजुर्वेद इनकी मूर्ति है।
यहीं भगवान्‌ वेदत्रयी के रूप में भी हैं ये ही काल की आत्मा हैं, काल के कर्ता हैं और स्वयं प्रकाश हैं। सभी प्राणियों की आत्मा हैं सर्वत्रव्यापी एवं सूक्ष्म हैं तथा सब कुछ इन्हीं में प्रतिष्ठित है।
विश्वरूपी रथ में संवत्सर (वर्ष) का चक्र लगाकर तथा छन्द-रूपी अश्वों को युक्त कर भगवान्‌ सूर्य सदैव पर्यटन (भ्रमण) करते रहते हैं।
भगवान्‌ सूर्य के तीन पाद अमृत हैं, अर्थात्‌ कभी नष्ट न होने वाले हैं, इसलिए वे अगम्य हैं। एक चतुर्थ पाद से ही प्रकट (दृश्य) हैं। उसी (सूर्य) भगवान्‌ ने अहंकार स्वरूप ब्रह्मा को संसार की सृष्टि के लिए उत्पन्न किया।
उस समस्त लोकों के पितामह (ब्रह्मा) को श्रेष्ठ वेदों को प्रदान कर तथा उन्हें अण्ड के मध्य में स्थापित कर स्वयं भगवान्‌ (सूर्य) समस्त विश्व को प्रकाशित करते हुये परिभ्रमण करने लगे।
तदनन्तर अहंकार मूर्ति रूपी ब्रह्मा ने सृष्टि रचना का मन में विचार किया। ब्रह्म के मन से चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई तथा नेत्रों से प्रकाशात्मा (प्रकाश स्वरूप) सूर्य की उत्पत्ति हुई।
(उस) ब्रह्मा के मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी की क्रमश: उत्पत्ति हुई। एक-एक गुणों की वृद्धि से ये पाँचों पञ्च महाभूत कहे गये हैं।
अग्नि सोमात्मक सूर्य और चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई। अर्थात्‌ अग्नि स्वरूप (तैजस-पिण्ड) सूर्य की तथा सोम (अमृत) स्वरूप (जलमय-पिण्ड) चन्द्र की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर क्रमश: तेज (अग्नि) महाभूत से मंगल, भू (पृथ्वी) से बुध, आकाश से बृहस्पति, जल से शुक्र तथा वायु से शनि की उत्पत्ति हुई।
इस प्रकार ब्रह्मा जिनके वशीभूत समस्त सृष्टि है उन्होंने अपने आप (ब्रह्माएड) को द्वादश भागों में विभक्त कर दिया जो राशि संज्ञक हुये। तथा पुन: उस ब्रह्माण्ड को सत्ताइस भागों में विभक्त किया तो वे नक्षत्र संज्ञक हुये।
तत्पश्चात (ग्रहनक्षत्र आदि की सृष्टि के अनन्तर) ब्रह्मा ने उत्तम, मध्यम, अधम स्रोतों से सत्व-रज-तम स्वरूप त्रिगुणात्मक प्रकृति की रचना कर देव आदि (देव-मनुष्य-असुर-पशु-पक्षि-वृक्ष-छता प्रभूति) चर-अचर (चेतन-जड़) विश्व की रचना की।
तत्पश्चात्‌ गुण-कर्म विभागानुसार पूर्वकल्पोक्त विधि से (चराचर) सृष्टि की रचनाकर वेदों में बताये गये मार्गनुसार
ग्रहनक्षत्र तारा भूमि विश्व (भूर्भुवादि) देव-असुर मनुष्य एवं सिद्ध आदि का ब्रह्मा ने विभाजन किया।
यह ब्रह्माण्ड अण्ड के मध्य का अत्यन्त विस्तृत छिद्र है। अर्थात्‌ दो अण्ड कटाहों के मध्य का विशाल रिक्त स्थान अनन्त आकाश संज्ञक हैं। दो अण्ड कटाहों द्वारा सम्पुट होने से यह गोल आकृति वाला है। इसी के मध्य में भूर्भुवादि लोक अवस्थित हैं।
ब्रह्माण्ड (अण्ड कटाह) की भीतरी परिधि कक्षा या आकाश कक्षा कही गई हैं। उसके मध्य में अधोध: (एक दूसरे से नीचे) क्रम से नक्षत्रादि भ्रमण करते हैं।
नक्षत्रों के नीचे क्रमश: शनि, बृहस्पति, भौम, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा को कक्षायें हैं जिनमें वे भ्रमण करते हैं। ग्रहों के नीचे क्रमश: सिद्ध विद्याधर और घन (मेघ) हैं।
ब्रह्माण्ड के चारों ओर से मध्य भाग में यह भूगोल ब्रह्मा की धारणात्मिका परमशक्ति (आकर्षण शक्ति) से आकाश में अवस्थित है।
पृथ्वी के आन्तरिक भाग में नाग और असुरों के आश्रय रूप में तथा दिव्य औषधियों (प्रकाश युक्त वनस्पतियों) एवं रसों से युक्त अतिसुन्दर सात पाताल भूमि हैं। (यहाँ पृथ्वी के अन्तरपुट में सात पाताल भूमियों का उल्लेख है जो व्यावहारिक दृष्टि से असंगत हैं क्‍योंकि पृथ्वी के भीतरी भाग में ऐसा खोखला स्थान नहीं है जहाँ कोई नगरी बस सके । अत: यहाँ "तदन्तरपुटा" का अर्थ "पृथिव्या अन्तरपुटा" न लेकर "अण्डकटाहस्यान्तरपुटा सप्तपातालभूमय:" इस प्रकार का अन्वय करने से ही संगति हो सकती है। यहाँ अण्डकटाह के अन्दर ही अनेक लोकों की कल्पना युक्तिसंगत हो सकती है।)
अनेक रत्नों के समूह से परिपूर्ण जाम्बूनद (स्वर्णनदी) से युक्त भूगोल के मध्य में गया हुआ तथा पृथ्वी के दोनों भाग (उत्तर-दक्षिण) में निकला हुआ मेरु पर्वत है।
मेरु पर्वत के ऊपरी भाग (उत्तर दिशा) में इन्द्रादि देवता और महर्षिगण रहते हैं। इसी प्रकार अधोभाग (दक्षिण भाग) में असुर लोग रहते हैं जो (देव-असुर) परस्पर द्वेष भाव रखते है।
सुमेरु पर्वत के दोनों-भागों के मध्य में परिधि की तरह यह महा समुद्र (क्षार समुद्र) पृथ्वी की मेखला की तरह स्थित है। यह समुद्र देवों एवं असुरों की सीमा का विभाग भी करता है।
सुमेरु पर्वतों के मध्य भाग में (सुमेरु और कुमेरु के मध्यवर्ती समुद्र भाग में) तुल्य दूरी पर पूर्वादि दिशाओं में चार द्वीपों पर देवों द्वारा निर्मित किए गए चार नगर हैं।
पृथ्वी के चतुर्थाश भाग पर पूर्व दिशा में भद्राश्व वर्ष में यमकोटि नामक विख्यात नगर है जिसमें स्वर्णमयी दीवारें तथा स्वार्णमय द्वार हैं।
दक्षिणदिशा में भारत वर्ष में उसी प्रकार की लंका नामक महानगरी है। पश्चिम दिशा में केतुमालह वर्ष में रोमक नामक नगर कहा गया है।
उत्तर दिशा में कुरु वर्ष में सिद्ध पुरी नामक नगरी है। उस नगरी में पीडाओं से रहित सिद्ध महात्मा निवास करते हैं।
पृथ्वी की परिधि के चतुर्थाश भाग के अन्तर पर ये चारों नगर स्थित है। इन चारों नगरों से उतनी ही दूरी (भूवृत्तपाद) पर उत्तर दिशा में सुमेरु पर्वत है जहाँ देवताओं का निवास है।
नाडी वृत्त में स्थित (अर्थात्‌ सायनमेष राशि या सायनतुला राशि में स्थित) सूर्य उन चारों नगरों के ऊपर होता हुआ भ्रमण करता है। उन नगरों में विषुवच्छाया (पलभा) नहीं होती तथा अक्ष की उन्‍नति भी नहीं होती, अर्थात्‌ अक्षांश भी शून्य होता है।
मेरु पर्वत के दोनों भागों, अर्थात्‌ सुमेरु (उत्तर ध्रुव प्रदेश) तथा कुमेरु (दक्षिण ध्रुव प्रदेश) में ध्रुव तारा की स्थिति मध्य आकाश (खमध्य) में होती है। उत्तर में उत्तर ध्रुव खमध्यगत दक्षिण में दक्षिण ध्रुव खमध्यगत होता है।
जो निरक्षदेश (विषुवतीय प्रदेशों) में स्थित हैं उनके लिए दोनों भागों (उत्तर-दक्षिण) में ध्रुव तारा क्षितिज में स्थित होता है। अत: क्षितिजस्थ दोनों ध्रुव तारों (उत्तर-दक्षिण) की क्षितिज पर ऊँचाई न होने से उन (विषुवतीय) प्रदेशों में अक्षांश शून्य तथा लम्बांश ९० होता है। इसके विपरीत दोनों मेरु प्रदेशों में अक्षांश ९० तथा लम्बांश ० शून्य होता है।
मेषादि छ: राशियों में स्थित रहने पर सूर्य का दर्शन देव भाग में तथा तुलादि छ: राशियों में स्थित रहने पर सूर्य का दर्शन असुरों के भाग में होता है। मेषादि से कन्यान्त पर्यन्त छ: राशियों में भ्रमण करता हुआ सूर्य विषवुत (नाडी) वृत्त से उत्तर में ही रहता है अत: लगभग ६ मास पर्यन्त सूर्य का दर्शन उत्तर गोल में होता है। इसी प्रकार तुलादि से मीनान्त पर्यन्त ६ रशियों में सूर्य नाडी वृत्त से दक्षिण में रहता है अत: ६ मास पर्यन्त सूर्य का दर्शन दक्षिण गोल में ही होता है।
उक्त कारणों से (मेष से कन्या पर्यन्त) सूर्य के देवभाग में क्षितिज से ऊपर तथा खमध्य के आसन्न रहने से उत्तर गोल में सूर्य की रश्मियाँ तीव्र होती हैं जिनसे ग्रीष्म ऋतु में उत्तरगोल में गर्मी (उष्मा) होती है। इसी प्रकार तुलादि छ: राशियों में दक्षिण गोल में सूर्य के रहने से हेमन्त ऋतु में गर्मी होती है। इस से विपरीत स्थिति अर्थात्‌ उत्तर गोल में हेमन्त ऋतु में शीत तथा दक्षिण में ग्रीष्प ऋतु में शीत (सर्दी) होती है।
विषुवों (सायन मेष और सायन तुला) में सूर्य के रहने पर देवता और असुर दोनों ही सूर्य को क्षितिज पर देखते हैं। इनके दिन और रात एक दूसरे से विपरीत होते हैं।
दोनों मेरु स्थानों (ध्रुवों) से ९०” पर होने से नाडीवृत्त ही भ्रुवों का क्षितिज होता है। विषुवस्थ सूर्य नाडी वृत्त के ही धरातल में होता है। अत: देवता और असुर सूर्य को क्षितिज वृत्त में ही देखते हैं।
सायन मेषादि बिन्दु देवों (उत्तर गोल) के लिए सूर्योदय काल होता है तथा सायन तुलादि बिन्दु (दक्षिण गोल) असुरों का सूर्योदय काल होता है। मेषादि में सूर्य उदित होकर उत्तरोत्तर तीन राशियों में (मेष से मिथुन तक) भ्रमण करता हुआ मेरु वासी देवों के दिन का पूर्वार्ध पूर्ण करता है तथा कर्क आदि तीन (कर्क, सिंह, कन्या) राशियों में भ्रमण करता हुआ दिन के उत्तरार्ध को पूर्ण करता है।
इसी प्रकार तुलादि से धनुरनत तक असुरों का पूर्वार्ध तथा मकरादि से मीनानत तक दिन का उत्तरार्ध होता है। इसलिए दोनों के दिन और रात्रि एक दूसरे से विपरीत होते हैं। सूर्य का एक भगण (राशिचक्र की परिक्रमा) पूर्ण होने पर देवताओं एवं असुरों का एक अहोरात्र होता है।
देवताओं एवं असुरों का दिनार्ध (भध्याहन) एवं रात्र्यर्ध (मध्य रात्रि) अयनों के अन्त में एक दूसरे के विपरीत होते हैं। अर्थात्‌ उत्तरायण (सायन मिथुन) के अन्त में सूर्य के रहने पर देवों का मध्याहन और असुरों की मध्यरात्रि तथा धनुरन्त में असुरों का मध्याहन और देवों की मध्यरात्रि होती हैं। देवता और असुर एक दूसरे की अपेक्षा अपने को ऊपर स्थित मानते हैं, तथा दूसरे को अपने से नीचे की ओर मानते हैं।
सम सूत्र में स्थित अन्य लोग भी अपने से दूसरों को नीचे स्थित समझते हैं। भद्राश्व वर्ष और केतुमाल वर्ष में स्थित लोग एक दूसरे को अपने से नीचे मानते हैं। इसी प्रकार लंका निव्रासी सिद्धपुर के निवासियों को अपने से नीचे समझते हैं।
पृथ्वी (भू पृष्ठ) पर सर्वत्र अपना स्थान ऊपर ही प्रतीत होता है। (सभी लोग अपने आपको ऊपर तथा अन्य को तिर्यक या अधोमुख मानते हैं)। वस्तुत: अनन्त आकाश में स्थित गोल का न कहीं ऊर्ध्व है तथा न कहीं अध: है। अर्थात्‌ सर्वत्र समान रूप से पृथ्वी पर ऊपरी भाग में ही स्थिति ज्ञात होती है।
पृथ्वी की अपेक्षा मनुष्य अत्यल्पकाय (लघुशरीरवाला) है। अत: अपने स्थान से चारों ओर गोलाकार होते हुये भी पृथ्वी को चक्राकार (चिपिटा) देखता है।
यह भगोल (राशिचक्र या नक्षत्रचक्र) देवताओं के क्षेत्र अर्थात्‌ सुमेरु (उत्तरी ध्रुव) के आसन्न बायें से दाहिनी ओर तथा दैत्यों के क्षेत्र कुपेरु (दक्षिणी श्रुव) के आसन्न दक्षिण से बाम भाग में भ्रमण करता है। निरक्ष (भूमध्यरेखीय) प्रदेशों में नक्षत्र चक्र सदैव ऊपरी भाग (खमध्य) में पूर्व से पश्चिम की ओर भ्रमण करता हुआ दृश्य होता है।
अत: (रशशिचक्र के मस्तक के ऊपर भ्रमण करने से) निरक्षदेशीय (भूमध्यरेखीय) प्रदेशों में ३० घटी का दिन तथा ३० घटी की रात्रि होती है। तथा सुर और असुरों के भाग में सदैव एक दूसरे के विपरीत स्थिति में दिन और रात्रि में ह्रास वृद्धि होती है। अर्थात्‌ देवों के विभाग उत्तर गोल में जब दिन का मान ३० घटी से अधिक होगा तो असुरों के विभाग में रात्रि का मान ३० घटी से अधिक होगा।
मेषादि ६ राशियों में निरक्षदेश में उत्तरोत्तर क्रम से देवभाग में दिन मान की वृद्धि होती है तथा रात्रि मान का ह्रास होता है। इससे विपरीत असुर भाग में अर्थात्‌ निरक्ष देश से दक्षिण दिशा में जैसे जैसे बढ़ते जायेगें दिन का ह्रास तथा रात्रि की वृद्धि होती जायेगी।
तुलादि ६ राशियों में उक्त क्रम से विपरीत दिनरात्रि की क्षय वृद्धि देवों एवं असुरों के भागों में होती है। अर्थात्‌ तुलादि राशियों में उत्तर में दिन का ह्रास, रात्रि की वृद्धि तथा दक्षिण गोल में दिन की वृद्धि एवं रात्रि का ह्रास होता है। इस प्रकार ह्वास-वृद्धि के क्रम को पहले (स्पष्टाधिकार श्छोक सं. ६०-६१ ) में देश (अक्षांश) और सूर्य क्रान्ति द्वारा ज्ञात करने की विधि बतलाई गई है।
योजनात्मक मध्य भूपरिधि मान को अभीष्ट दिन की सूर्य क्रान्ति से गुणाकर भगणांश (३६०) से भाग देने पर जो योजनात्मक लब्धि प्राप्त हो, निरक्ष देश से उतने योजन की दूरी पर सूर्य के क्रान्ति की दिशा वाले देशों में मध्याहन काल में सूर्य खमध्यगत होता हुआ भ्रमण करता है।
सूर्य की परमक्रान्ति से पूर्वोक्त विधि से प्राप्त योजन मान को भूवृत्तपाद (भूपरिघ/ ४) से घटाकर शेष तुल्य योजन की दूरी पर निरक्ष देश से देव एवं असुर दोनों के विभागों में अर्थात्‌ उत्तर एवं दक्षिण गोल में अयनानत समय में (मिथुन और धनु के अन्त में) एक दूसरे से विपरीत एक दिन ६० घटी का दिन और ६० घटी की रात्रि होती है।
मिथुनान्त में उत्तर गोल में ६० घटी का दिन तथा दक्षिण गोल में ६० घटी को रात्रि इसी प्रकार धनुरन्त में दक्षिण गोल में ६० घटी का दिन तथा उत्तर गोल मे ६० घटी की रात्रि होती है।
निरक्ष देश से पूर्वोक्त विधि से प्राप्त योजनमान (६६ अक्षांश) तक ही ६० घटी के अन्दर दिन और रात्रि की क्षयवृद्धि होती है तथा अहोरात्र का मान ६० घटी होता है। इससे (६६ से) अधिक अक्षांश होने पर दिन रात्रि व्यवस्था भिन्‍न हो जाती है क्‍योंकि उन स्थानों में यह भगोल (राशिचक्र) विपरीत भ्रमण करता है।
द्विज्या (दो राशियों की ज्या) की क्रान्ति से प्राप्त योजन (श्लोक ५९ के अनुसार) मान को भूवृत्तपाद (भूपरिध/४) से घटाने पर जो शेष योजन हो, निरक्ष देश से उतने योजन पर देव भाग में (उत्तरगोल में) धनु और
मकर राशि स्थित सूर्य दृश्य नहीं होते। परिणामत: २ मास रात्रि रहती है। इसी प्रकार मिथुन और कर्क राशिगत सूर्य असुर भाग (दक्षिण गोल) में दृश्य नहीं होते। जहाँ पर मध्याहन कालिक छाया (शून्य) हो उस स्थान से भूपरिधि के चतुर्थाशं (भूपरिध/४) पर्यन्त सूर्य का दर्शन होता है। ऐसा समझना चाहिये।
एकज्या (एक राशि की ज्या) की क्रान्ति से सम्बन्धित योजन को भूपरिधि के चतुर्थाशं बन से घटाकर शेष योजन तुल्य निरक्षदेश से दूरी पर स्थित देवभाग (उत्तर गोल) के प्रदेशों में
वृश्चिक, धनु, मकर और कुम्भ राशियों के सूर्य दृश्य नहीं होते। तथा निरक्ष देश से उतनी ही दूरी पर असुरभाग (दक्षिण गोल) में वृष से चार राशि पर्यन्त अर्थात्‌ वृष-मिथुन-कर्क और सिंह राशि पर स्थित सूर्य दृश्य नहीं होते।
मेरु पर्वत (उत्तर ध्रुव) वासी देवता मेषादि छ: राशियों में एक बार उदित सूर्य. को ही देखते रहते हैं। अर्थात्‌ मेषादि छ: राशियों में ६ मास तक सूर्य क्षितिज के ऊपर रहते है सूर्यास्त ही नहीं होता। इसी प्रकार असुर लोग (कुमेरु या दक्षिण श्रुववासी) तुलादि छ: राशियों में ६ मास तक सूर्य को उदित ही देखते हैं।
भूमण्डल के १५ वें भाग अर्थात्‌ २४ पर देवताओं एवं असुरों दोनों के भागों में अर्थात्‌ निरक्ष से २४ उत्तर एवं २४ दक्षिण उत्तरायण और दक्षिणायन के अन्तिम बिन्दु मिथुनानत अहोरात्रवृत्त तथा धनुरन्‍त अहोरात्र वृत्त में सूर्य खमध्य में होता हुआ भ्रमण करता है।
इन दोनों बिन्दुओं या अहोणात्र वृत्तों (धनुरन्‍त से मिथुनान्‍त तक) के मध्यगत प्रदेशों में ही मध्याहनकालिक शड्कुच्छाया उत्तराभिमुखी या दक्षिणाभिमुखी हो सकती है। इससे भिन्‍न (२४ से अधिक) प्रदेशों में अपने अपने ध्रुवों की तरफ छाया जाती है। उत्तर गोल में उत्तराभिमुखी दक्षिण गोल में दक्षिणामिभमुखी छाया पड़ती है।
जब भद्राश्व वर्ष में यमकोटि नगर के खमध्य में सूर्य होता है उस समय भारत वर्ष में लड्ढा के क्षितिज पर सूर्योदय होता है।
उस समय केतुमाल वर्ष (रोमक पत्तन) में मध्यरात्रि तथा कुरुवर्ष (सिद्धपुर) में सूर्यास्त होता है। इसी प्रकार भारत आदि वर्षो में दिनार्ध, उदय, अर्ध-रात्रिकाल एवं अस्तकाल करते हुए सूर्य परिभ्रमण करते हैं।
ध्रुवाभिमुख गमन करने से क्रमश: ध्रुव की क्षितिज से उन्नति बढ़ती जाती है तथा नक्षत्र चक्र खमध्य से नीचे की ओर क्रमश: जाता है। अर्थात्‌ नक्षत्र चक्र नत हो जाता है। इसी प्रकार निरक्ष देश (विषुवतीय) प्रदेशों की ओर बढ़ने से क्रमश: नक्षत्र चक्र की उन्नति बढ़ती जाती है तथा ध्रुव तारा की उन्नति घटती जाती है। अर्थात्‌ नतांश बढ़ता जाता है।
नक्षत्र चक्र ध्रुवों से आबद्ध होकर प्रवह वायु के वेग से प्रेरित होकर निरन्तर भ्रमण करता रहता है तथा नक्षत्र चक्र से आबद्ध ग्रह कक्षायें भी क्रमानुसार भ्रमण करती हैं।
देवता और असुर (उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव) दोनों ही एक बार सूर्योदय होने पर उसे आधे वर्ष अर्थात्‌ ६ मास तक देखते रहते हैं (देव और असुरों के भाग में ६ मास का दिन और ६ मास की रात्रि होती है)। चन्द्रमा के पृष्ठ भाग में रहने वाले पितृगण १५ दिन (१ पक्ष) तक सूर्य का दर्शन करते हैं अर्थात्‌ चन्द्र के पृष्ठ में १५ दिनों का दिन तथा १५ दिनों की रात्रि होती है। जबकि भूपृष्ठ वाले मनुष्य गण अपने अपने स्थानीय दिनमान के अनुसार सूर्य (दिन) का अवलोकन करते हैं।
जिन ग्रहों की कक्षा ऊपर (पृथ्वी से दूर) है उनका परिमाण बृहत्‌ है तथा जो ग्रहकक्षा नीचे (पृथ्वी के सन्निकट) है उनका परिमाण अल्प है। बृहत्‌ कक्षाओं के अंश प्रमाण बड़े तथा छोटी कक्षाओं के अंश प्रमाण छोटे होते है।
अल्प वक्षाश्रित ग्रह अल्पकाल में भगण पूर्ति करते हैं। बृहत्‌ कक्षाश्रित ग्रह अधिक काल में भगण पूर्ति करते हैं।
अल्प कक्षाश्रित चन्द्रमा समान काल में अधिक भगण (३६० का चक्र) पूर्ण करता हैं जबकि बृहत्‌ कक्षाश्रित होने से शनि स्वल्प भगण ही पूर्ण कर पाता है।
शनि से नीचे के (कक्षा क्रम से) चौथे-चौथे ग्रह क्रमश: वासरों के अधिपति तथा क्रमश: तीसरे तीसरे ग्रह वर्षाधिपति कहे गये हैं।
चन्द्रमा के ऊर्ध्वक्रम में क्रमश: मासों के स्वामी तथा शनि से अधोध: (नीचे-नीचे) क्रम से होरेश ग्रह कहे गये हैं।
सूर्य के भ्रमण मार्ग अर्थात्‌ कक्षा योजन को ६० से गुणा करने पर नक्षत्र कक्षा का मान होता है। उन्हीं योजन प्रमाणों से सभी ग्रहों के ऊपर भमण्डल (नक्षत्र मण्डल) भ्रमण करता है।
कल्पचन्द्र भगण (एक कल्प में होने वाले चन्द्र भगण) की संख्या को चन्द्र की कक्षा: (कक्षायोजन) से गुणा करने पर जो गुणनफल होता है उसे खकक्षा जानना चाहिये तथा उसी सीमा तक सूर्य की किरणें व्याप्त रहती हैं।
उक्त खकक्षा मान को जिस ग्रह की कल्प भगण संख्या से भाग दिया जायेगा भागफल उस ग्रह की कक्षा का योजनात्मक मान होगो। कल्प सावन दिवसों से आकाश कक्षा में भाग देने पर सभी ग्रहों की पूर्वाभिमुखी योजनात्मक गति ज्ञात होती है।
ग्रहों की योजनात्मिका गति को चन्द्र कक्षा योजन से गुणाकर स्व स्व कक्षा योजनों से भाग देकर लब्धि को पुनः १५ से भाग देने पर तत्तद्‌ ग्रहों की गति का कलात्मक मान होता है।
ग्रह कक्षा को भू-व्यास से गुणाकर भू-परिधि से भाग देने पर लब्धि ग्रह कक्षा का व्यास होता है। कक्षा-व्यास में भू-व्यास को घटाकर आधा करने से भू-पृष्ठ से ग्रह की उँचाई होती है। ( भूपृष्ठ से ग्रह की योजनात्मक दूरी होती है )
पूर्वोक्त रीति से साधित ग्रहों की कक्षाओं का पृथक्‌ पृथक्‌ योजनात्मक मान इस प्रकार है:- चन्द्रकक्षा योजन = ३२४००० बुध शीघ्रकेन्द्र कक्षा योजन = १०४३२०९
शुक्र शीघ्रकेन्द्र कक्षा योजन = २६६४६३७ सूर्य बुध शुक्र का कक्षा योजन - ४३३१५००
भौम की कक्षा का योजन = ८१४६९०९ चन्द्रोच्च का कक्षा योजन = ३८३२८४८४
गुरु का कक्षा योजन = ५१३७५७६४ राहु (सम्पात) कक्षा योजन = ८०५७२८६४
शनि कक्षा योजन = १२७६६८२५५ नक्षत्रकक्षा योजन = २५९८९००००
इस ब्रह्माण्ड (कटाह सम्पुट) की भीतरी परिधि के अन्दर चारों तरफ सूर्य की किरणों का विस्तार है। अर्थात्‌ जहाँ तक सूर्य रश्मियाँ जाती हैं वहीं तक खकक्षा है। खकक्षा का मान १८७१२०८०८६४०००००० योजन है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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