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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 22
ब्रह्मण: कर्तव्यतां निरूपयति अथ सुृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माउहड्जारमूर्तिभृत्‌ । मनसश्चन्द्रमा जन्ञे सूर्योजक्ष्णोस्तेजसां निधि: ।।
तदनन्तर अहंकार मूर्ति रूपी ब्रह्मा ने सृष्टि रचना का मन में विचार किया। ब्रह्म के मन से चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई तथा नेत्रों से प्रकाशात्मा (प्रकाश स्वरूप) सूर्य की उत्पत्ति हुई।
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