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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 53
भूमौ मानवस्थिति वर्णनम्‌ सर्वत्रेव महीगोले स्वस्थानमुपरि स्थितम्‌ । मन्यन्ते खे यतो गोलस्तस्य क्वो्ध्व क्‍्व वाप्यध: ॥
पृथ्वी (भू पृष्ठ) पर सर्वत्र अपना स्थान ऊपर ही प्रतीत होता है। (सभी लोग अपने आपको ऊपर तथा अन्य को तिर्यक या अधोमुख मानते हैं)। वस्तुत: अनन्त आकाश में स्थित गोल का न कहीं ऊर्ध्व है तथा न कहीं अध: है। अर्थात्‌ सर्वत्र समान रूप से पृथ्वी पर ऊपरी भाग में ही स्थिति ज्ञात होती है।
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