पृथ्वी के आन्तरिक भाग में नाग और असुरों के आश्रय रूप में तथा दिव्य औषधियों (प्रकाश युक्त वनस्पतियों) एवं रसों से युक्त अतिसुन्दर सात पाताल भूमि हैं। (यहाँ पृथ्वी के अन्तरपुट में सात पाताल भूमियों का उल्लेख है जो व्यावहारिक दृष्टि से असंगत हैं क्योंकि पृथ्वी के भीतरी भाग में ऐसा खोखला स्थान नहीं है जहाँ कोई नगरी बस सके । अत: यहाँ "तदन्तरपुटा" का अर्थ "पृथिव्या अन्तरपुटा" न लेकर "अण्डकटाहस्यान्तरपुटा सप्तपातालभूमय:" इस प्रकार का अन्वय करने से ही संगति हो सकती है। यहाँ अण्डकटाह के अन्दर ही अनेक लोकों की कल्पना युक्तिसंगत हो सकती है।)
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