भगवान् सूर्य के तीन पाद अमृत हैं, अर्थात् कभी नष्ट न होने वाले हैं, इसलिए वे अगम्य हैं। एक चतुर्थ पाद से ही प्रकट (दृश्य) हैं। उसी (सूर्य) भगवान् ने अहंकार स्वरूप ब्रह्मा को संसार की सृष्टि के लिए उत्पन्न किया।
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