दोनों मेरु स्थानों (ध्रुवों) से ९०” पर होने से नाडीवृत्त ही भ्रुवों का क्षितिज होता है। विषुवस्थ सूर्य नाडी वृत्त के ही धरातल में होता है। अत: देवता और असुर सूर्य को क्षितिज वृत्त में ही देखते हैं।
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