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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 55
भगोल भ्रमण व्यवस्था सव्यं भ्रमति देवानामपसव्य॑ सुरद्दिषाम । उपरिष्टाद्‌ भगोलोआ्य व्यक्षे पश्चान्मुख: सदा ॥
यह भगोल (राशिचक्र या नक्षत्रचक्र) देवताओं के क्षेत्र अर्थात्‌ सुमेरु (उत्तरी ध्रुव) के आसन्न बायें से दाहिनी ओर तथा दैत्यों के क्षेत्र कुपेरु (दक्षिणी श्रुव) के आसन्न दक्षिण से बाम भाग में भ्रमण करता है। निरक्ष (भूमध्यरेखीय) प्रदेशों में नक्षत्र चक्र सदैव ऊपरी भाग (खमध्य) में पूर्व से पश्चिम की ओर भ्रमण करता हुआ दृश्य होता है।
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