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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 56
दिनमान व्यवस्था अतस्तत्र दिन त्रिंशन्‍नाडिकं शर्वरी तथा । हासवृद्धी सदा वाम॑ सुरासुरविभागयो:।।
अत: (रशशिचक्र के मस्तक के ऊपर भ्रमण करने से) निरक्षदेशीय (भूमध्यरेखीय) प्रदेशों में ३० घटी का दिन तथा ३० घटी की रात्रि होती है। तथा सुर और असुरों के भाग में सदैव एक दूसरे के विपरीत स्थिति में दिन और रात्रि में ह्रास वृद्धि होती है। अर्थात्‌ देवों के विभाग उत्तर गोल में जब दिन का मान ३० घटी से अधिक होगा तो असुरों के विभाग में रात्रि का मान ३० घटी से अधिक होगा।
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