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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 65
मासचतुष्टयात्मक दिनरात्रिव्यवस्था एकज्यापक्रमानीतैयोजनै:. परिवजिति । भूमिकक्षाचतुथशि व्यक्षाच्छेषैस्तु योजनै: ।।
एकज्या (एक राशि की ज्या) की क्रान्ति से सम्बन्धित योजन को भूपरिधि के चतुर्थाशं बन से घटाकर शेष योजन तुल्य निरक्षदेश से दूरी पर स्थित देवभाग (उत्तर गोल) के प्रदेशों में
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