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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 72
श्रुव-नक्षत्रचक्रयोरन्तरम्‌ ध्रुवोन्नतिर्भचक्रस्य नतिर्मेरु प्रयास्यत: । निरक्षाभिमुखं यातुर्विपरीते नतोनन्‍नते।।
ध्रुवाभिमुख गमन करने से क्रमश: ध्रुव की क्षितिज से उन्नति बढ़ती जाती है तथा नक्षत्र चक्र खमध्य से नीचे की ओर क्रमश: जाता है। अर्थात्‌ नक्षत्र चक्र नत हो जाता है। इसी प्रकार निरक्ष देश (विषुवतीय) प्रदेशों की ओर बढ़ने से क्रमश: नक्षत्र चक्र की उन्नति बढ़ती जाती है तथा ध्रुव तारा की उन्नति घटती जाती है। अर्थात्‌ नतांश बढ़ता जाता है।
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