मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 51
देवासुराणां दिनाध्ध॑ रात्र्यर्द्धब्च दिनक्षपार्धभेतेषमयनान्ते. विपर्ययात्‌ । उपर्यात्मानमन्योजन्यं कल्पयन्ति सुरासुरा: ॥
देवताओं एवं असुरों का दिनार्ध (भध्याहन) एवं रात्र्यर्ध (मध्य रात्रि) अयनों के अन्त में एक दूसरे के विपरीत होते हैं। अर्थात्‌ उत्तरायण (सायन मिथुन) के अन्त में सूर्य के रहने पर देवों का मध्याहन और असुरों की मध्यरात्रि तथा धनुरन्त में असुरों का मध्याहन और देवों की मध्यरात्रि होती हैं। देवता और असुर एक दूसरे की अपेक्षा अपने को ऊपर स्थित मानते हैं, तथा दूसरे को अपने से नीचे की ओर मानते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सूर्य सिद्धांत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सूर्य सिद्धांत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें