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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 50
अतो दिनक्षपे तेषामन्योन्यं हि विपर्ययात्‌। अहोरात्रप्रमाणं च भानोर्भगणपूरणात्‌ ॥
इसी प्रकार तुलादि से धनुरनत तक असुरों का पूर्वार्ध तथा मकरादि से मीनानत तक दिन का उत्तरार्ध होता है। इसलिए दोनों के दिन और रात्रि एक दूसरे से विपरीत होते हैं। सूर्य का एक भगण (राशिचक्र की परिक्रमा) पूर्ण होने पर देवताओं एवं असुरों का एक अहोरात्र होता है।
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