सूर्याश पुरुष ने मय को संबोधित करते हुये कहा - “एकाग्रचित्त होकर सुनो! मै अत्यन्त गुह्य (रहस्यमय) अध्यात्म संज्ञक शास्त्र को कह रहा हूँ। मेरे पास अतिभक्तों (जिज्ञासु शिष्यों) के लिए कुछ भी अदेय नहीं है।"
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