सूर्याशस्योत्तरक्रम्
इति भकत्योदितं श्रुत्वा मयोक्तं वाक्यमस्य हि ।
रहस्य परमध्याय ततः प्राह पुन: स तम् ॥
इस प्रकार भक्ति पूर्वक मय द्वारा कहे गये वचनों (पूछे गये प्रश्नों) को सुनकर सूर्याशावतार पुरुष ने पूर्वोक्त ग्रहचरित के अनन्तर अत्यन्त रहस्यमय उत्कृष्ट ज्ञानयुक्त उत्तरवर्ती ज्योतिष शास्त्र रूपी अध्यायों को पुन: कहा।
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