पैत्र्य-मानुषदिनव्यवस्था
पित्रयं मासेन भवति नाडीषष्ट्या तु मानुषम् ।
तदेव किल सर्वत्र न भवेत् केन हेतुना ॥
पितरों का अहोरात्र एक चान्द्र मास क़े तुल्य तथा मनुष्यों का अहोरात्र ६० घटी के तुल्य होता है। यही (षष्टि घटिकात्मक) अहोरात्र सर्वत्र क्यों नहीं होता इसमें क्या-हेतु (कारण) है?
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