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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 60
षष्टि घट्यत्मक दिनमान स्थलानि परमापक्रमादेव॑ योजनानि विशोधयेत्‌ । भूवृत्तपादाच्छेषाणि यानि स्युर्योजनानि तै:॥
सूर्य की परमक्रान्ति से पूर्वोक्त विधि से प्राप्त योजन मान को भूवृत्तपाद (भूपरिघ/ ४) से घटाकर शेष तुल्य योजन की दूरी पर निरक्ष देश से देव एवं असुर दोनों के विभागों में अर्थात्‌ उत्तर एवं दक्षिण गोल में अयनानत समय में (मिथुन और धनु के अन्त में) एक दूसरे से विपरीत एक दिन ६० घटी का दिन और ६० घटी की रात्रि होती है।
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