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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 12 • श्लोक 69
तदन्तरालयोश्छाया याम्योदक्‌ सम्भवत्यपि । मेरोरभिमुखं याति परत: स्वविभागयो: ॥
इन दोनों बिन्दुओं या अहोणात्र वृत्तों (धनुरन्‍त से मिथुनान्‍त तक) के मध्यगत प्रदेशों में ही मध्याहनकालिक शड्कुच्छाया उत्तराभिमुखी या दक्षिणाभिमुखी हो सकती है। इससे भिन्‍न (२४ से अधिक) प्रदेशों में अपने अपने ध्रुवों की तरफ छाया जाती है। उत्तर गोल में उत्तराभिमुखी दक्षिण गोल में दक्षिणामिभमुखी छाया पड़ती है।
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