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अध्याय 12 — द्वादशोल्लासः
कुलार्णव
121 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं पादुका की भक्ति के लक्षण और उससे सम्बन्धित आचार के विषय में सुनना चाहती हूँ, हे देवेश, हे करुणनिधे उसे बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे बताऊँगा, जिसके सुनने से भक्ति तुरन्त उत्पन्न होती है।
कुलार्णव में पादुका का ज्ञान उसी प्रकार प्रतिष्ठित है, जिस प्रकार वाक् से उत्पन्न सूत्रादि मूलाधार में सन्त्रिविष्ट है।
कोटि कोटि महादानों, कोटि कोटि महाबतों और कोटि कोटि महायज्ञों से भी श्रेष्ठ श्रीपादुका की स्मृति है।
कोटि कोटि मन्त्र जप से, कोटि तीर्थों के स्नान से और हे देवि! कोटि देवपूजन से बढ़कर श्री पादुका की स्मृति है।
महारोग, महाउपद्रव, महादोष, महाभय, महाआपत्ति और महापाप में स्मरण करने से पादुका रक्षा करती है।
दुराचार, दुरालाप, दुःसङ्ग, दुष्पतिग्रह, दुराहार और दुर्बुद्धि में फँसने पर स्मरण करने से पादुका रक्षा करती है।
अतः पादुका का पाठ किया जाता है, उसे याद रखा जाता है, उसे, जाना जाता है, इष्टरूप से माना जाता है, गुरु द्वारा दी जाती है और उसकी पूजा की जाती है। जिसकी जिह्वा के अग्र भाग में श्रीपादुका की स्मृति सदा रहती है। अथवा हे देवि! जो एक बार भी भक्ति से श्रीपादुका मन्त्र का जप करता है, वह सब पापों से छूटकर परम गति को पाता है।
पवित्र हो या अपवित्र, जो भक्ति से पादुकास्मरण करता है, वह सहज ही धर्मार्थ, काम एवं मोक्ष को प्राप्त करता है।
हे प्रिये! श्री नाथ के चरणकमल जिस दिशा में विराजते हों, उस दिशा को प्रतिदिन भक्ति से नमस्कार करे।
हे प्रिये! पादुका से श्रेष्ठ मन्त्र नहीं है, श्रीगुरु से श्रेष्ठ देव नहीं है, शाक्त से श्रेष्ठ दीक्षा नहीं है और कुल पूजा से श्रेष्ठ पुण्य नहीं है।
ध्यान का मूल श्री गुरु का स्वरूप, पूजा का मूल गुरुचरण, मन्त्र का मूल गुरु वाक्य और मोक्ष का मूल गुरुकृपा है।
हे कुलनायिके! इस संसार में सभी क्रियाओं के मूल श्रीगुरु हैं। अतः सिद्धि के लिये भक्तिपूर्वक नित्य गुरु की सेवा करे।
जब तक भक्तवत्सल श्री गुरु की शरण नहीं मिलती, तभी तक व्याकुलता, भय, शोक, लोभ, मोह, प्रम आदि का कष्ट रहता है।
हे देवेशि! जब तक प्राणियों की भक्ति सद्गुरु में नहीं होती, तभी तक वे सब प्रकार के दुःखों से पीड़ित होकर संसार में भटकते फिरते हैं।
सर्व सिद्धियों के फल से युक्त मन्त्र तब तक सिद्ध नहीं होता, जब तक गुरु में भक्ति नहीं होती। परम तत्त्व से युक्त इस महान् क्रम का मूल गुरु की प्रसन्नता है।
जिस प्रकार सन्तुष्ट और प्रसन्न होकर बरदायक मन्त्र को प्रदान करे, उसी प्रकार भक्तिपूर्वक धन और प्राणों से गुरु को यत्न करके प्रसन्न करे।
जब उत्तम देशिक (आचार्य) अपने शिष्य को अपनी आत्मा प्रदान करते हैं, तब वह शिष्य मुक्त हो जाता है और इसके बाद उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
शिष्य गुरु की तब तक आराधना करे, जब तक वे प्रसन्न न हो जायँ। क्योंकि गुरु के प्रसन्न होते ही शिष्य के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
लोग जिन कामनाओं की मन से आकांक्षा भी नहीं करते, वे सब भक्त वत्सल स्वामी की कृपा से पूरी हो जाती हैं।
गुरु के प्रसन्न होने पर ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवता, मुनि और योगी प्रसन्न होकर अनुग्रह करते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
भक्ति से प्रसन्न कृपालु गुरु द्वारा जिसे उपदेश मिलता है, वह शिष्य कर्मों से मुक्त होकर भोग और मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
हे देवेशि! शिष्य वैसा ही कार्य करे, जिससे गुरु सन्तुष्ट हों। वह मन, बचन, शरीर और कर्मों से उनका प्रिय करे। सन्तुष्ट गुरु द्वारा अपने शिष्य से कहीं पर यदि यह कहा जाता है कि 'आप मुक्त हो' तो हे प्रिये! वह मुक्ति को प्राप्त करता है।
अथवा ईश्वर गुरु रूप से निष्वपञ्च तेज द्वारा पशु पाशों से छुड़ा देता है।
चतुर्वेदी मुझे प्रिय नहीं है। यदि मेरा भक्त श्वपच (चाण्डाल) भी है, तो वह मुझे प्रिय है! उसे देना चाहिये, उससे लेना चाहिये क्योंकि वह मेरे समान ही पूज्य है।
विप्र चाहे छः गुणों से युक्त हो किन्तु अभक्त होने से प्रशस्त नहीं है। गुणहीन म्लेच्छ भी भक्तिमान् होने से शिष्य कहा जाता है।
गुरुभक्ति से विहीन व्यक्ति का तप, ज्ञान, कुल और व्रत सभी लोक दृष्टि में वहीं नष्ट हो जाते हैं। ये सजावट ही रहते हैं (और उसे स्वर्ग नहीं मिलता)।
गुरुभक्तिरूपी अग्नि से जिस चाण्डाल की दुर्बुद्धि आदि पाप जल चुके हैं, वह श्रेष्ठों द्वारा पूजनीय है, किन्तु नास्तिक विद्वान् होकर भी पूज्य नहीं है।
श्रीगुरु में सब भावों में जिसकी भक्ति सदा स्थिर रहती है, हे देवि! उसके हाथ में धर्म, अर्थ, काम क्या मोक्ष तक विद्यमान रहता है।
'वे शिव ही गुरुरूप से मुझे भुक्ति, मुक्ति प्रदान करने वाले हैं' - इस प्रकार भक्ति से जो स्मरण करता है, उसे उत्तम सिद्धि शीघ्र मिलती है।
हे कुलेश्वरि! जिसे गुरु में वैसी ही परम भक्ति होती है, जैसी देवता में, उसे उन अर्थों का ज्ञान हो जाता है, जो मैंने आपको बताये हैं।
नारायण, महादेव, माता पिता और राजा के प्रति जैसी भक्ति होती है, हे महादेवि! वैसी ही भक्ति अपने गुरु के प्रति करे।
श्रीगुरु और गुरुपत्नी को लक्ष्मी, नारायण, सरस्वती, ब्रह्मा, गिरिजा, शिव तथा माता, पिता के रूप में ध्यान करे।
हे देवि! गुरु की भक्ति से जिस प्रकार सब सिद्धियाँ मिलती है हे प्रिये! उस प्रकार की सिद्धि यज्ञ, दानों, तपों, तीर्थों तथा व्रतों आदि से नहीं प्राप्त की जा सकती।
हे कुलनायिके! श्रीगुरु में निश्चला भक्ति जैसे जैसे बढ़ती है, वैसे ही वैसे उसे विशेष ज्ञान की प्राप्ति होती है।
तीर्थादि में महान् श्रम से क्या लाभ और व्रतों से शरीर सुखाने से क्या लाभ? हे देवेशि! सद्गुरु की यह भक्ति तो निर्व्याज सेवा है।
शरीर को कष्ट देकर, महान् तप से जो फल मिलता है, हे देवि! बह गुरु सेवा द्वारा सरलता से मिल जाता है।
भोग, मोक्ष और ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के पद की आकांक्षा करनेवालों के लिये गुरुभक्ति ही एक मार्ग है, अन्य नहीं, ऐसा श्रुति कहती है।
महापापों से उत्पन्न अशुभ कर्मों को भक्ति वैसे ही क्षण भर में जला डालती है, जैसे अग्नि रुई के ढेर को क्षण भर में भस्म कर देती है।
सब सिद्धियों के देने वाले गुरु पर किए गए उस विश्वास को नमस्कार है, जिससे कीचड़, लकड़ी और पत्थर भी तत्काल ही पूर्ण फल को प्रदान करते हैं।
योग, तप अथवा पूजा क्रम - किसी से भी माया दूर नहीं होती। मायारहित इस कुलमार्ग में भक्ति की ही विशेषता है।
हे देवि! गुरु द्वारा व्याप्त समस्त भुवन में सभी भक्तों को कौन सा मन्त्र सिद्ध नहीं होता है।
गुरु को मनुष्य, मन्त्र को अक्षर और प्रतिमा को पत्थर समझने वाला नरक में जाता है।
गुरु को मरणशील न माने क्योंकि वैसा मानने से मन्त्रों या देवपूजाओं से कभी सिद्धि नहीं मिलती।
हे प्रिये! श्री गुरु को साधारण मनुष्यों के साथ जो स्मरण करते हैं या उनकी चर्चा करते हैं, उनके सभी पुण्य पाप बन जाते हैं।
जन्म देने के कारण माता पिता की पूजा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिये। धर्म, अधर्म का ज्ञान कराने वाले गुरु विशेष रूप से पूजनीय हैं।
गुरु पिता है, गुरु माता हैं और स्वयं देव महेश्वर भी गुरु ही हैं। शिव भगवान् के रुष्ट होने पर गुरु रक्षा करते हैं किन्तु स्वयं गुरु के रुष्ट होने पर कोई नहीं बचा सकता।
गुरु को जो प्रिय हो, वही मन, वचन, शरीर एवं कर्म द्वारा करे। हे देवि! उनका अप्रिय करने से विष्ठा में कीड़े का जन्म मिलता है।
जो शरीर, धन और प्राणों से श्री गुरु को धोखा देते हैं, वे निस्सन्देह कीड़े और पतङ्गों का जन्म पाते हैं।
मन्त्र का त्याग करने से मृत्यु, गुरु का त्याग करने से दरिद्रता और गुरु एवं मन्त्र का त्याग करने से रोरव नरक की प्राप्ति होती है।
गुरु के लिए शरीर रखे, उन्हीं के लिए धन कमाए एवं अपने प्राणों को छोड़कर भी गुरु का कार्य सम्पन्न करे।
गुरु के कठोर वचन को आशीर्वाद समझे। उनकी ताड़ना को भी उनका प्रसाद माने।
हे कुलेश्वरि! भोग्य-भोज्य वस्तुएँ गुरु को अर्पित करे और उनसे बचा हुआ मानकर उन्हें प्रसाद रूप में ग्रहण करे।
गुरु के सामने न तप करे, न उपवास करे, न व्रत करे, न तीर्थ अथवा यात्रा आदि भी न करे, और न अपनी शुद्धि के लिए स्नान ही करे।
गुरु की अवज्ञा न करे, आप कहकर न बोले, शिष्य होकर ऋण देना लेना या वस्तुओं को खरीदना बेचना गुरु के साथ कभी न करे।
हे ईश्वरि! नास्तिकों से दूर रहे। नास्तिकों के साथ वाद-विवाद क्या, बात भी न करे। उन्हें देख कर दूर चला जाय और कभी उनके साथ न रहे।
हे अम्बिके! गुरु के निकट होने पर जो अन्य की पूजा करता है, उसकी वह पूजा निष्फल होती है और वह घोर नरक में पड़ता है।
गुरु के चरणकमलों को धारण करने वाले शिर पर कभी बोझ न ले जाय। उनकी आज्ञा से ही कार्य करे क्योंकि निःसन्देह गुरु ही आशास्वरूप है।
अन्य स्थान पर सुने हुए मन्त्र, आगम आदि को गुरु को बताए और उनकी आज्ञा से ग्रहण करे। उनके द्वारा मना किए गए मन्त्रादि से दूर रहे।
अपने शास्त्र में कहे गये रहस्यार्थ को जिस किसी को न बताए, जो बताता है, वह 'समय' (आचार) से च्युत होता है, इसमें सन्देह नहीं।
हे कुलेश्वरि! नित्य अद्वैत भाव रखे, गुरु से कभी द्वैतभाव न रखे। अपने समान ही सभी प्राणियों का हित करे।
१. आत्मा से, २. घन से, ३. सम्मान से और ४. सद्भाव से। हे देवि! सेवाबुद्धि से गुरु को सन्तुष्ट करे।
गुरु, देवता और महात्माओं की सेवा में लगा हुआ शिष्य निश्चय ही पग-पग पर अश्वमेध का फल पाता है।
हे प्रिये! केवल गुरुसेवा से ही आपकी कृपा मिल जाती है। सद्भक्ति के साथ यदि सेवा करे, तो सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।
गुरु की सेवा से सभी पाप नष्ट होते हैं, पुण्यराशि बढ़ती है और हे प्रिये! गुरु शुश्रुषा से सभी कार्य सिद्ध होते हैं।
जो जो वस्तु अपने को प्रिय हो, वह गुरु को अर्पित करे। जो गुरुदेव की अर्चना करता है, उसके पुण्य की गणना नहीं हो सकती।
भक्ति से यथाशक्ति गुरु के लिये जो किया जाता है, वह थोड़ा या बहुत निर्धन या धनी का पुण्य एक समान होता है।
गुरु को सर्वस्व भी जो बिना भक्ति के देता है, वह शिष्य उसका फल नहीं पाता क्योंकि भक्ति ही मूल है।
जिस द्रव्य में गुरु की इच्छा हो, उसे स्वयं न ग्रहण करे। यदि बहुत इच्छा हो, तो उनकी अनुमति से उसे ग्रहण करे।
जो लोभ या मोह से गुरु के धन का तिलार्ध या उसके आधे बराबर भी अंश का उपयोग करता है। वह २१ वर्ष पर्यन्त नरक में रहता है।
हे प्रिये! बिना दिये हुये गुरु के अत्यल्प द्रव्य को भी जो स्वीकार करता है, वह तिर्यंग् योनि को पाता है और उसे क्रव्याद खाते हैं।
गुरुद्रव्य की इच्छा करने वाले, गुरु स्त्री गमन में उत्सुक होने वाले पतित तथा नीच के लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
आज्ञा न मानना, धन चुराना और गुरु का अप्रिय करना - इन्हें 'गुरुद्रोह' कहा गया है। जो ऐसा करता है, वह पापी है।
गुरु को निवेदन किये बिना द्रव्य का उपभोग न करे। बिना निवेदन किए जो उपभोग करता है, वह ब्रह्मघाती होता है।
गुरु के स्थान, सम्प्रदाय और धर्म को जो नष्ट करता है, वह गुरुओं द्वारा त्याज्य, दण्डनीय होकर घातकों द्वारा वध्य होता है।
गुरु क्रोध से विनाश, गुरु द्रोह से पाप, गुरु निन्दा से अपमृत्यु और गुरु का अनिष्ट करने से महान् विपत्ति होती है।
जीवित अग्नि में प्रवेश करे या विष पी ले या मृत्यु के हाथ में पड़ जाय किन्तु गुरु का अपराध न करे।
जहाँ श्री गुरु की निन्दा हो, हे अम्बिके! वहाँ से दोनों कान बन्द कर तुरन्त चला आये, जिससे पुनः वह शब्द न सुनाई पड़े। बाद में प्रायश्चित्त रूप से गुरुनाम का स्मरण करे।
गुरु के मित्र, सुहृद, दासी, दास की अवज्ञा न करे और न उनके समय, बेद, शास्त्रागम आदि की निन्दा करे।
गुरु की श्रीपादुका पूजा, गुरु नाम स्मरण एवं जप, गुरु की आज्ञा पालन कर्तव्य है, और गुरुसेवा ही भजन है।
जिज्ञासु देशिक (गुरु) के निवास स्थान में शान्त चित्त, अतिभक्तिपूर्ण होकर वाहन, पादुका, छत्र, चामर, व्यञ्जन और ताम्बूल, काजलादि आडम्बर छोड़कर धीरे से प्रवेश करे।
गुरु की पादुका, आसन, वस्त्र, वाहन, छत्र और चामर को देखकर उन्हें नमस्कार करे और अपने उपयोग में उन्हें लाने की इच्छा न करे।
हे प्रिये! गुरु, योगी एवं महासिद्ध के पीठ, क्षेत्र, आश्रमों में पैर घोना, स्नान करना, तेल लगाना, दातून करना, मल, मूत्र त्याग करना, बूकना, बाल कटाना, सोना, स्वीसङ्ग करना, बीरासन से बैठना, कठोर बात करना, आज्ञा चलाना, हँसना, रोना, बाल खोलना, नंगे होना, पैर फैलाना, झगड़ा करना, अङ्ग भङ्ग करना, चिढ़ाना, मटकाना, ताली बजाना, ताल ठोकना, सिर पीटना, जुआ खेलना, कुश्ती लड़ना, नाचना बजाना आदि नहीं करना चाहिए। हे अम्बिके! मोहवश यदि कोई करता है, तो उसे देवता का शाप मिलता है।
गुरु के सम्मुख आचारानुसार बैठे, मनमाने ढंग से नहीं। उनके मुख का दर्शन करते हुए उनकी सेवा करे और उनके कथन का पालन करे।
हे प्रिये! गुरु के कहे और न कहे कार्यों की उपेक्षा न करे। हृदय से उनका सम्मान करे, गुरु जो कहें, उसे निःशङ्क होकर (बिना तर्क के) करे।
निग्रह और अनुग्रह - सबके कारण गुरु हैं। गुरुमुख से जो निकले, वह सब शास्त्र कहा गया है।
हे प्रिये! गुरु के कार्य में स्वयं समर्थ हो, तो बहुत से नौकरों के होते हुए भी भक्तिमान् शिष्य दूसरे को न भेजे।
चलते, बैठते, सोते-जागते, जपते, हवन-पूजन करते गुरु-आज्ञा का ही अन्तरात्मा से पालन करे।
जाति, विद्या, धन आदि से अभिमान न करे, सदा शिष्य श्री गुरु के निर्कट रहकर उनकी नित्य सेवा करे।
काम, क्रोध छोड़कर, विनम्र हो, स्तुति एवं भक्ति के साथ हे देवि! श्रद्धारूप आसन पर बैठकर गुरु का कार्य करे।
अपना कार्य हो या दूसरे का, शिष्य गुरु का ध्यान करते हुए, गुरु के निकट नम्रतापूर्वक प्रसन्नमुख होकर रहे।
गुरु द्वारा निषिद्ध सामान्य बात को भी यदि गुरु के पास कोई करता है, तो उसका दोष कोटि गुना अधिक होता है।
जो अच्छे या बुरे गुरुवाक्य का अनादर कर उसे मुंह फिरा कर सुनता है, वह रौरव नरक में जाता है।
गुरु के आगे झूठ बोलने से शिष्य को वही पाप होता है, जो गो एवं ब्राह्मण के वध से लगता है।
हे प्रिये! गुरु के अन्यत्र जाने पर कठिन परिस्थिति में स्थित होने पर कहीं भी उनका साथ न छोड़े, उनके आदेशानुसार ही अनुवर्तन करे।
अधः आसन पर गुरु के बैठने पर कभी ऊपर न बैठे। गुरु के आगे न चले और उनके उठने पर बैठा न रहे।
शक्ति, देवता और गुरु की छाया को लांघे नहीं। उन पर अपनी छाया न डाले और गुरु के सन्निकट सोए नहीं।
बिना गुरु की आज्ञा पाये और बिना गुरु की बन्दना किए भाषण, पाठन, गायन, भोजन, शयन आदि न करे।
गुरुआज्ञा का पालन करने में सौ ब्रह्महत्या तक कर सकता है। गुरु की आज्ञा बिना अन्य किसी का विश्वास न करे।
गुरु की आज्ञा से सब करे किन्तु हे प्रिये! उनकी स्त्रियों की निन्दा न करे और भक्ति से हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम कर खड़ा रहे।
गुरु के गृह से प्रणाम कर पीछे को पैर रखता हुआ बाहर निकले। गुरु के बराबर एक ही आसन पर न बैठे जिस पर गुरु अपने समकक्ष जनों के साथ बैठे हों।
हे देवि! देवता और गुरु के समीप आसन पर न बैठे। गुरु को श्रेष्ठ आसन और ज्येष्ठ लोगों को उत्तम आसन प्रदान करे। छोटों को देश्यासन (पहले से नियत आसन) और दूसरों को अपने समकक्ष समासन दे।
जाति, विद्या एवं धन से सम्पन्न व्यक्ति गुरु को दूर से ही देखकर प्रसत्र हो और उन्हें दण्डप्रणाम करे और तीन बार उनकी प्रदक्षिणा करे।
हे प्रिये! तब गुरु, परम गुरु के क्रम से अपने गुरु की तीन, छः, बारह या एक बार वन्दना करे।
फिर गुरु को नमस्कार करे। श्री गुरु के समीप होने पर उन्हें मन से नमस्कार न करे।
गुरुबुद्धि से देवता या तृण तक सबको नमस्कार करे। देवबुद्धि से लोहे और मिट्टी की प्रतिमा को नमस्कार न करे।
गुरु को तीन बार, ज्येष्ठों को एक बार प्रणाम करे और पूज्यों को हाथ जोड़कर तथा अन्यों की वाणी से वन्दना करे।
हे कुलनायिके! देवों, गुरुओं, कुलाचार्यों, ज्ञानियों, तपस्वियों, विद्वानों और स्वधर्मियों को प्रणाम करे।
स्त्रीद्वेषी, गुरुओं से शापित, पाखण्डी पण्डित, ठग, दुष्कर्मी, कृतघ्न, और अनाश्रमी को नमस्कार न करे।
एक ही स्थान में रहते हुये जो गुरु को निवेदित किये बिना भोजन करता है, उसका अन्न अमेध्य (अपवित्र) हो जाता है और उसे खाने वाला मरने पर शूकर होता है।
गुरु-शिष्य एक ही स्थान में रहते हों तो शिष्य गुरु को (प्रातः, मध्यान्ह एवं सायं) तीनों सन्ध्याओं में प्रणाम करे । एक क्रोश (दो मील) की दूरी पर रहने वाला शिष्य गुरु को प्रतिदिन नमन करे।
अर्ध योजन (चार मील) की दूरी पर रहने वाला शिष्य पञ्च पर्वों में प्रणाम करे। एक योजन से बारह योजन की दूर पर रहने वाला शिष्य हे प्रिये! उनकी संख्या के दिनों या महीनों में श्री गुरु को प्रणाम करे।
दूर देश में स्थित शिष्य उतने योजन की संख्या के महीनों में गुरु के पास आकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। किन्तु बहुत दूर गया हुआ शिष्य जब इच्छा हो, तब आये।
राजा, देवता और गुरु के पास खाली हाथ न जाय। यथा-शक्ति फल, पुष्प, वस्त्रादि अर्पित करे। हे देवि! ऐसा जो नहीं करता, वह ब्रह्म-राक्षस होता है।
गुरुशक्ति, गुरुपुत्र और गुरु का ज्येष्ठ श्राता ये गुरु के समान माने गये हैं।
छोटे को आत्मवत् समझकर पुत्र के समान उसका पालन करे। हे देवेशि! कुलाचार्य के ज्येष्ठ और कनिष्ठ दोनों सम्बन्धियों को गुरुतुल्य ही प्रणाम करे।
हे देवि! १. याग (योग) में ज्येष्ठ, २. क्रम में ज्येष्ठ, ३. कुल में ज्येष्ठ और ४. गुरु का ज्येष्ठ पुत्र - ये चार ज्येष्ठ माने गये हैं। याग-ज्येष्ठ को अभिवादन से और क्रम ज्येष्ठादि को अष्टाङ्ग योग से तथा गुरु एवं कुलवृक्ष (कुलशक्ति) इन दोनों को यथाविधि वन्दन करे।
पिता आदि सभी कोटि पूज्य बन्धुओं के प्रति उठकर प्रणाम आदि स्पष्ट रूप से करे क्योंकि प्रणामादि न करने से दोष होता है। जब अपने को आचार्य रूप में प्रकट करे, तब उठकर प्रणामादि करने से दोष होता है।
पशुपति होकर जो पशुओं को प्रणाम करता है, वह महापशु कहा जाता है और उसे देवता का शाप मिलता है।
जो पादुका परिसंख्या (ध्यान) से गुरुस्थान को प्राप्त करता है, हे प्रिये! वह ज्येष्ठों और पुत्रों में गुरुवत् माननीय है।
इस प्रकार संक्षेप में मैंने आपसे पादुकाभक्ति के लक्षण बताये। अब आप क्या सुनना चाहती है?
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