छोटे को आत्मवत् समझकर पुत्र के समान उसका पालन करे। हे देवेशि! कुलाचार्य के ज्येष्ठ और कनिष्ठ दोनों सम्बन्धियों को गुरुतुल्य ही प्रणाम करे।
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