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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 116
आत्मविच्च कनीयांसं पुत्रवत् परिपालयेत् । कुलाचार्यस्य देवेशि गुरुज्येष्ठकनिष्ठयोः । गुरुकल्पस्य कुर्वीत प्रणामं स्वरगुरोर्यथा ॥ यागज्येष्ठः क्रमज्येष्ठः कुलज्येष्ठस्तृतीयकः ।
छोटे को आत्मवत् समझकर पुत्र के समान उसका पालन करे। हे देवेशि! कुलाचार्य के ज्येष्ठ और कनिष्ठ दोनों सम्बन्धियों को गुरुतुल्य ही प्रणाम करे।
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