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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 84
उपचारेण सन्तिष्ठेद् गुर्वत्रे नेच्छया विशेत् । मुखावलोकी सेवेत तदुक्तञ्च समाचरेत् ॥
गुरु के सम्मुख आचारानुसार बैठे, मनमाने ढंग से नहीं। उनके मुख का दर्शन करते हुए उनकी सेवा करे और उनके कथन का पालन करे।
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