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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 117
गुरुज्येष्ठसुतो देवि इति ज्येष्ठचतुष्टयम् ॥ यागज्येष्ठाभिवादेन क्रमिकाष्टाङ्गयोगतः । गुरुश्च कुलवृक्षश्च वन्दनीयौ विधानतः ॥
हे देवि! १. याग (योग) में ज्येष्ठ, २. क्रम में ज्येष्ठ, ३. कुल में ज्येष्ठ और ४. गुरु का ज्येष्ठ पुत्र - ये चार ज्येष्ठ माने गये हैं। याग-ज्येष्ठ को अभिवादन से और क्रम ज्येष्ठादि को अष्टाङ्ग योग से तथा गुरु एवं कुलवृक्ष (कुलशक्ति) इन दोनों को यथाविधि वन्दन करे।
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