दूर देश में स्थित शिष्य उतने योजन की संख्या के महीनों में गुरु के पास आकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। किन्तु बहुत दूर गया हुआ शिष्य जब इच्छा हो, तब आये।
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