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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 85
गुरूक्तानुक्त कार्येषु नोपेक्षां कारयेत् प्रिये । शिरसा यद्‌गुरुर्ब्रयात्तत् कार्यमविशङ्कया ॥
हे प्रिये! गुरु के कहे और न कहे कार्यों की उपेक्षा न करे। हृदय से उनका सम्मान करे, गुरु जो कहें, उसे निःशङ्क होकर (बिना तर्क के) करे।
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