शिष्येणापि तथा कार्यं तथा सन्तोषितो गुरुः । प्रियं कुर्याच्च देवेशि मनोवाक्कायकर्मभिः ॥
यदि तुष्टेन गुरुणात्मशिष्यो यत्र कुत्रचित् । मुक्तोऽसीति समादिष्टः सोऽपि मुक्तिं व्रजेत् प्रिये ॥
हे देवेशि! शिष्य वैसा ही कार्य करे, जिससे गुरु सन्तुष्ट हों। वह मन, बचन, शरीर और कर्मों से उनका प्रिय करे। सन्तुष्ट गुरु द्वारा अपने शिष्य से कहीं पर यदि यह कहा जाता है कि 'आप मुक्त हो' तो हे प्रिये! वह मुक्ति को प्राप्त करता है।
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