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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 83
पादप्रक्षालनं स्नानमध्यङ्गं दन्तधावनम् । मूत्रं निष्ठीवनं क्षौरं शयनं स्त्रीनिषेवनम् ॥ वीरासनं सुदुर्वाक्यं शासनं हास्यरोदनम् । केशमोचनमुष्णीषं कञ्चुकं नग्नतां तथा ॥ पादप्रसारणं वादं कलहं दूषणं प्रिये । अङ्गभङ्गाङ्गवाद्यादिकरास्फालनधूननम् ॥ घृतकौतुकमल्लादियुद्धनृत्यादि चाम्बिके । गुरुयोगिमहासिद्धिपीठ क्षेत्राश्रमेषु ना च। चरेदाचरेन्मोहाद्देवताशापमाप्नुयात् ॥
हे प्रिये! गुरु, योगी एवं महासिद्ध के पीठ, क्षेत्र, आश्रमों में पैर घोना, स्नान करना, तेल लगाना, दातून करना, मल, मूत्र त्याग करना, बूकना, बाल कटाना, सोना, स्वीसङ्ग करना, बीरासन से बैठना, कठोर बात करना, आज्ञा चलाना, हँसना, रोना, बाल खोलना, नंगे होना, पैर फैलाना, झगड़ा करना, अङ्ग भङ्ग करना, चिढ़ाना, मटकाना, ताली बजाना, ताल ठोकना, सिर पीटना, जुआ खेलना, कुश्ती लड़ना, नाचना बजाना आदि नहीं करना चाहिए। हे अम्बिके! मोहवश यदि कोई करता है, तो उसे देवता का शाप मिलता है।
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