विप्रः षड्गुणयुक्तश्चेदभक्तो न प्रशस्यते ।
म्लेच्छोऽपि गुणहीनोऽपि भक्तिमान् शिष्य उच्यते ॥
विप्र चाहे छः गुणों से युक्त हो किन्तु अभक्त होने से प्रशस्त नहीं है। गुणहीन म्लेच्छ भी भक्तिमान् होने से शिष्य कहा जाता है।
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