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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 105
ततो नमेद् गुरुं वापि गुर्वाज्ञां न विचारयेत् । प्रगुरोः सन्निधौ शिष्यः स्वगुरुं मनसा नमेत् ॥
फिर गुरु को नमस्कार करे। श्री गुरु के समीप होने पर उन्हें मन से नमस्कार न करे।
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