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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 102
न विशेदासने देवि देवतागुरुसन्निधौ । गुरोः सिंहासनं देयं ज्येष्ठानामुत्तमासनम् । देश्यासनं कनिष्ठानामितरेषां समासनम् ॥
हे देवि! देवता और गुरु के समीप आसन पर न बैठे। गुरु को श्रेष्ठ आसन और ज्येष्ठ लोगों को उत्तम आसन प्रदान करे। छोटों को देश्यासन (पहले से नियत आसन) और दूसरों को अपने समकक्ष समासन दे।
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