अत्यल्पं हि गुरोर्द्रव्यमदत्तं स्वीकरोति यः ।
स तिर्थम् योनिमापन्नः क्रव्यादैर्भक्ष्यते प्रिये ॥
हे प्रिये! बिना दिये हुये गुरु के अत्यल्प द्रव्य को भी जो स्वीकार करता है, वह तिर्यंग् योनि को पाता है और उसे क्रव्याद खाते हैं।
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