स्वकार्यमन्यकार्य वा शिष्यः स्वगुरुचित्तवित् ।
गुरुपार्श्वगतो नम्रः प्रसन्नवदनो भवेत् ॥
अपना कार्य हो या दूसरे का, शिष्य गुरु का ध्यान करते हुए, गुरु के निकट नम्रतापूर्वक प्रसन्नमुख होकर रहे।
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