गुरुभक्त्यग्निना सम्यग्दग्धदुर्मतिकल्मषः ।
श्वपचोऽपि परैः पूज्यो विद्वानपि न नास्तिकः ॥
गुरुभक्तिरूपी अग्नि से जिस चाण्डाल की दुर्बुद्धि आदि पाप जल चुके हैं, वह श्रेष्ठों द्वारा पूजनीय है, किन्तु नास्तिक विद्वान् होकर भी पूज्य नहीं है।
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