ततस्त्रिः षड् द्वादश वा ज्येष्ठादिष्वेकमेव वा ।
गुरुप्रगुरुयोगेन वन्देत प्रगुरु प्रिये ॥
हे प्रिये! तब गुरु, परम गुरु के क्रम से अपने गुरु की तीन, छः, बारह या एक बार वन्दना करे।
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