जीवेदग्निप्रविष्टो वा नरः पीतविषोऽपि वा ।
मृत्युहस्तगतो वापि नापराधकरो गुरोः ॥
जीवित अग्नि में प्रवेश करे या विष पी ले या मृत्यु के हाथ में पड़ जाय किन्तु गुरु का अपराध न करे।
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